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भारत की भाषा संबंधी बहस में हिंदी की भूमिका: मातृभाषा के लिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी से लेकर अमित शाह तक का योगदान

हिंदी दिवस भाजपा योगदान

--- भारत की भाषा संबंधी बहस में हिंदी की भूमिका: मातृभाषा के लिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी से लेकर अमित शाह तक का योगदान लेख आप ऑपइंडिया वेबसाइट पे पढ़ सकते हैं ---

2019 में 14 सितंबर को हिंदी दिवस के अवसर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि भारत की भाषाओं और बोलियों की विविधता को एक बाधा के बजाए शक्ति के स्रोत के रूप में देखा जाना चाहिए। विज्ञान भवन में बोलते हुए गृह मंत्री ने बताया था कि कैसे हिंदी सभी भारतीय भाषाओं में सबसे व्यापक रूप से बोली जाने वाली भाषा है। यह एक एकीकृत भाषा के रूप में कार्य कर सकती है और गैर-देसी ज़बानों की भूमिका को बदल सकती है।

भारतीय भाषाओं की विविधता का सम्मान करने की प्रधानमंत्री की प्रतिबद्धता प्रमुखता से स्पष्ट है। 2020 की नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) में बच्चे की मातृभाषा में शिक्षण के लिए दी गई प्राथमिकता का आधार ही यही है। एनईपी 2020 का मातृभाषा पर मजबूत ध्यान यह सुनिश्चित करता है कि बच्चे की ऊर्जा एक नई भाषा सीखने के बजाए सीखने की अवधारणाओं पर खर्च की जाए। एनईपी आदिवासी भाषाओं की रक्षा के महत्व को भी दर्शाती है। मेरे गृह राज्य तेलंगाना में अनुसूचित क्षेत्रों वाले कम से कम 10 जिले हैं। आदिवासी समुदायों जैसे लाम्बाद, कोया, गोंड, युरकल, चेन्चस और अन्य के बच्चे आदिवासी भाषाओं के प्रचार के साथ-साथ उससे होने वाले लाभ को भी पा सकेंगे।

संविधान निर्मात्री सभा में बहस

वास्तव में, भाषा के रूप में पार्टी को भाषावादियों द्वारा कैसे चित्रित किया जाता है, इसके विपरीत, भारतीय जनता पार्टी ने हमेशा सभी भाषाओं और बोलियों का सम्मान करने का रास्ता दिखाया है। पार्टी की समावेशी भाषा नीतियों के उदाहरणों के लिए 13 सितंबर 1949 को संविधान निर्मात्री सभा में हुई बहस को फिर याद करने की जरूरत है। हिंदी की भूमिका पर एक सावधानीपूर्वक तैयार की गई बहस पर (मुंशी-अयंगर समझौता फॉर्मूला) भारतीय जनसंघ के डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा:

“ऐसा क्यों है कि गैर-हिंदी भाषी प्रांतों से जुड़े कई लोग हिंदी को लेकर थोड़े परेशान हो गए हैं? अगर हिंदी के नायक मुझे ऐसा कहने के लिए क्षमा करेंगे, तो क्या वे अपनी माँगों और हिंदी को लागू करने में इतने आक्रामक नहीं थे? उन्होंने जो चाहा, वह मिल गया, भारत की संपूर्ण जनसंख्या के सहज और इच्छुक सहयोग से ‘शायद जो उन्हें उम्मीद थी, उससे कहीं अधिक।”

मुंशी-अयंगर समझौता फॉर्मूला ने हमारे संविधान के अनुच्छेद 343 के लिए आधार बनाया, जो हिंदी को देवनागरी लिपि में आधिकारिक भाषा (राजभाषा) के रूप में पहचान देता है। डॉ. मुखर्जी अन्य क्षेत्रों में हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार करने के लिए मजबूर करने के हठी रुख के लिए हिंदी क्षेत्र वाले कॉन्ग्रेस नेताओं को फटकार रहे थे।

दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी और उसके वैचारिक अग्रदूत जनसंघ ने अपने स्थापना के दिनों से ही सभी भारतीय भाषाओं के प्रचार और संरक्षण का समर्थन किया है। वास्तव में, डॉ. मुखर्जी का भाषण, भाषा नीतियों के लिए पार्टी के समावेशी दृष्टिकोण का एक खाका रहा है:

“भारत कई भाषाओं का देश रहा है। यदि हम अतीत में जाएँ तो पाएँगे कि इस देश में सभी लोगों द्वारा किसी एक भाषा को स्वीकार करने के लिए मजबूर करना किसी के लिए भी संभव नहीं रहा है। मेरे कुछ मित्रों ने स्पष्ट रूप से कहा कि एक दिन ‘आ सकता है जब भारत में एक भाषा और केवल एक भाषा होगी’। सच कहूँ, तो मैं ऐसे दृष्टिकोण को साझा नहीं करता हूँ …।”

जबकि उन राजनेताओं ने नई दोष-पंक्तियों को खोजने में रुचि रखते हुए जानबूझकर हिंदी की स्थिति को ‘राजभाषा’ (आधिकारिक भाषा) के साथ ‘राष्ट्रभाषा’ के रूप में मिलाया है। सरकार का दृढ़ विश्वास है कि कोई भी भारतीय भाषा किसी भी अन्य से कम नहीं है।

भारत की समृद्ध विविधता का श्रेय कई भाषाओं और विशाल साहित्य एवं मौखिक इतिहास तथा परंपराओं को दिया जा सकता है, जो हमारी भाषाओं में मौजूद है।

आठवीं अनुसूची- अधिक भाषाओं को शामिल करने में भाजपा की भूमिका

शुरू में भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में 14 भाषाओं को अपनाया गया था, जो कि राजभाषा संबंधी संसद की समिति में शामिल की जानी थी। इसमें असमिया, बंगाली, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, मलयालम, मराठी, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, तमिल, तेलुगू और उर्दू शामिल थीं। आदिवासी भाषाओं जैसे संथाली और तिब्बती-बर्मी भाषाओं जैसे नेपाली, मणिपुरी और बोडो को शुरू में कोई स्थान नहीं दिया गया था।

22 जून 1962 को जनसंघ के यूएम त्रिवेदी सिंधी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए लोकसभा में एक निजी सदस्य विधेयक लेकर आए और 17 अगस्त 1962 को अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे राज्यसभा में पेश किया। सदन में बहस के दौरान, जब पूछा गया कि क्या सिंधी को उर्दू लिपि में लिखा जाना है, तो वाजपेयी ने जवाब दिया:

“सिंधी लोगों द्वारा लिपि का प्रश्न सुलझाया जाएगा। हमें इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। यदि वे चाहें, तो स्वयं की लिपि को बरकरार रख सकते हैं या देवनागिरी को अपना सकते हैं। लेकिन, हमारे लिए, हिंदी भाषी लोगों के लिए, इस मामले में अपनी राय व्यक्त करना उचित नहीं होगा…।”

अप्रैल 1967 में निरंतर दबाव के बाद, सिंधी को संविधान के बीसवें संशोधन के माध्यम से आठवीं अनुसूची में जोड़ा गया। 1990 के दशक में मीतेई, नेपाली और कोंकणी संविधान के 71वें संशोधन के माध्यम से प्रस्तुत की गईं। दोनों, 21वें और 71वें संशोधनों में निजी सदस्य विधेयकों के माध्यम से सरकार पर नई भाषाओं को जोड़ने के लिए जोर दिया गया। भाजपा ने इन बिलों में से प्रत्येक को बिना शर्त समर्थन दिया।

दिसंबर 2003 में श्री एलके आडवाणी द्वारा 92वाँ संशोधन पेश किया गया और बोडो, संथाली, मैथिली एवं डोगरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया। देश की भाषाई विविधता के लिए पार्टी की प्रतिबद्धता ने पहली मुंडा भाषा, यानी संथाली को अनुसूचित भाषाओं की सूची में जोड़ा।

विशेष निर्देश- अनुच्छेद 351

इन सबमें संविधान के अनुच्छेद 351 के माध्यम से हिंदी की विशेष भूमिका है। अनुच्छेद 351 का विशेष निर्देश केंद्र को हिंदी के प्रसार को बढ़ावा देने और इसे विकसित करने की जिम्मेदारी सौंपता है ताकि यह अभिव्यक्ति के एक माध्यम के रूप में एवं अपने संवर्धन को सुरक्षित कर सके।

इसकी सहायता के लिए जून 1975 में गृह मंत्रालय के स्वतंत्र विभाग के रूप में राजभाषा विभाग की स्थापना की गई। इस पृष्ठभूमि को देखते हुए, यह पूछने की आवश्यकता होगी कि क्या किसी अन्य भारतीय भाषा की कीमत पर हिंदी को बढ़ावा दिया जा रहा है अथवा क्या हिंदी संघ की अन्य भाषाओं के साथ सहर्ष अस्तित्व में हो सकती है?

गृह मंत्री ने 2019 में हिंदी दिवस पर उस बहस को सुस्पष्ट ढंग से सुलझा दिया था- एक एकीकृत भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका न तो स्थिति और न ही अन्य भारतीय भाषाओं के कद को प्रभावित करेगी।

(जी. किशन रेड्डी भारत सरकार में मंत्री हैं और सिकंदराबाद लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह लेख उन्होंने 2020 में हिंदी दिवस पर लिखा था जिसे दोबारा प्रकाशित किया जा रहा है)



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